Yunhi Kuch Normal Si Jindagee
यूँही कुछ नार्मल सी जिंदगी , शायद नॉर्मल्सी -या यूं कहूँ की बोरिंग सी जिंदगी - हम सब ज्यादातर यही सोचते है। पहले तो ये समझाना जरूरी है , की नार्मल और हप्पेनिंग मे क्या फरक है ? शायद उत्तर अब तक ढूंढ रहा हूँ - चलो की माना -की ये आम आदमी की जिंदगी है -पर क्या किसी की जिंदगी आम होती है ? नहीं मै नहीं मानता -हर जिंदगी के साथ जुड़ी हुईं हैं कई कहानियाँ -उन सब कहािनयोँ के साथ जुडे हुए है कई किस्से - और ये किस्से हमारे साथ हमारी यादोँ मै जिन्दा रहेंगी अक्खरी साँस तक।मेरी कोशिश रहेंगी की ऊन सब कहानियों और किस्से को अपने ब्लॉग में लिखूँ , मैं उन तमाम लोगोँ के बारे मैं कहना चाहता हू , जो जाने अनजाने मै मेरे साथ जुड़ चुके है. जिनको मैं चाह कर भी अपने जिंदगी से नहीं नीकाल नहीं पाउँगा
अब दुर्गेश को ही देखो , अभी तो हलफिलहाल मुझे मिला , बेचारा अपनी नौकरी को बचाने के लिए , बीवी से दूर .है, और उसकी धर्मपत्नी =बेचारी ( ना जाने बेचारी बोलने का मन तो नहीं हो रहा है )- वो सब चीज़ोँ से दूर है। दुर्गेश रात को मेरे पास अपना दुखड़ा रोता है -और उसकी बीवी पड़ोसी के पास दुखड़ा रोती है - और मैं इन दोनों की कहानी पर रोता हू -शादी के आठ साल बाद भी जुड के भी अलग है
बनेर्जी तो बस , उसका क्या कहना -बिजी तो वो इतना रहता है की दिन के बारह बजे के पहले नहीं उठता , और जो समाये बचता है वो अपने मोबाइल पर खेलता है - पर जनाब आजकल राइटर बनना चाहते है -अब मोबाइल छूटे तो कलम हाथ मे आये ना ? अब भगवान ने तो तीन हाथ दिए नहीं है ना ? पर तमननाओं की कोई सीमा होती नहीं - अब बनेर्जी कल मोगली बनना चाहे तो मै क्या कर सकता हू।
बस ऐसेही कुछ लोगोँ के साथ मैं रहता ह- कुछ तो पीछे छूठ गए -शायद मै रुक गया -वो आगे निकल गयें -कुछ मोड़ पर साथ आकर मुड़ गये - कुछ साथ भी हें , कुछ साथ रहकर भी साथ नहीं हैं - कुछ खामोसी के साथ पीछे खड़े मिलेंगे - और कुछ ऐसे भी हैँ जो दूर हैं , पर साथ ही चलेंगे - इन्ही मै से कुछ नाराज भी हें - पर हाँ - एक चीज़ जो सब मिल कर कहेंगे - क्या यार ये क्या लिखा घटिया जिंदगी के बारे मै । मैं तो सिर्फ मुस्कुरोऊंगा और कहूँगा -जाने भी दो यारोँ -
शायद यही है -यूँही कुछ नॉर्मल सी जिन्दंगी
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